देर आए दुरुस्त आए

 मिठाई का डिब्बा लिए आज कलुआ को देखा, आश्चर्य से भर गई । मन सोचते हुए उस पुरानी घटना पर अटक गया और सोचने लगी  कि अरे कैसे उस दिन इन्होंने कलुआ को अपनी गाड़ी के नीचे तक दबा दिया था, जब वो आधी  रात को अंधेरे में नशेड़ियों और जुआरियों के साथ दारू के नशे में, पेड़ के नीचे बैठा जुआ खेल रहा था और इनको गाड़ी की लाइट में दिख गया था झूम झूम ठहाका लगाते हुए, इनको ग़ुस्सा आता भी क्यों न, सुबह ही कलुआ बच्चे की बीमारी के बहाने इनसे ५०० रुपया माँग ले गया था । 

कलुआ हमारा पुराना माली था, अतः हम सब फ़िक्रमंद थे। रात की घटना के बाद हमने सुबह ही कलुआ के बीवी और माँ बाप को बुला लिया और कलुआ को ख़ूब धमकवाया,माँ बाप से कहा कि तुम सब इसे छोड़ दो हम भी छोड़ देंगे, घर और ऑफ़िस सब जगह से निकाल देंगे,ये दर दर भीख माँगेगा, होश ठिकाने आ जाएँगे, आख़िर हद होती है।घरवाले पहले से परेशान थे, सब तुरत राज़ी हो गए।आख़िर ये कोई पहली घटना नहीं थी।

     कलुआ हफ़्ते भर इधर उधर भटकता रहा, थक हारकर एक दिन आकर इनके पैर पड़ गया, माफ़ी माँग ली, और वादा किया कि अब वो सुधर जाएगा । वो दिन और आज का दिन कलुआ धीरे धीरे रास्ते पे आ गया, और जब उसे सरकारी आवास मिला तो उसी में अपने भी पैसे मिलाकर घर और एक दुकान बनवाया है, जिसकी दावत पतिदेव घर जाकर खा आए और मेरे लिए कलुआ मिठाई लेकर हाज़िर है।           

**जिज्ञासा सिंह**     

एक पाती भाई के नाम

आदरणीय भैया,
             सादर प्रणाम !
 आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है, कि आप भाभी और बच्चों के साथ कुशल से होंगे, इधर कई दिनों से सोचने के बाद भी,व्यस्तता के कारण आपको चिट्ठी नहीं लिख पाई, भाभी का पत्र आया था,उसका जवाब दे दिया था शायद मिल गया हो,पर कोई सूचना नहीं है ।
   आप को तो पता ही है कि रक्षा बंधन आने वाला है, इस बार मैं नहीं आ पाऊंगी,क्योंकि मेरी भी ननद अपने भैया को राखी बांधने आ रही हैं, आप तो जानते ही हैं कि इतनी दूर से उनका आना बहुत दिनों बाद होता है, और इस बार तो वो दो साल पर आ रही हैं,अतः उनको छोड़कर आना मेरे लिए मुश्किल होगा, इसलिए आप भाभी को लेकर आ जाइएगा, समय न हो तो दो ही दिन का समय निकाल लीजिए अच्छा लगेगा और ये भी खुश हो जाएंगे,बच्चे तो वैसे भी मामा को देख निहाल हो जाते हैं, बड़ी दीदी को भी बोल दिया है, वो भी यहीं मेरे घर आ जाएंगी, सब साथ रहेंगे, मजे करेंगे ।
           छोटे भैया को भी बोल दिया है, सपरिवार आने के लिए, उनके साथ पिता जी भी आएंगे, सबसे मुलाकात हो जाएगी । देखिए क्या कार्यक्रम बनाते हैं,वो लोग,वैसे अपनी तरफ से मैंने ज़ोर देकर लिखा है आने के लिए । लगे हाथ आप अक्षिता से भी रखी बंधवा लीजिएगा । नहीं तो चाची जी सोचेंगी कि वहां तक गए और मेरी बेटी के घर नहीं गए और वो तो मेरे घर के पास ही रहती है ।
         शेष सब ठीक है, यहाँ माता जी स्वस्थ हैं, वो भी अपने भाई के इंतजार में राखी का दिन उंगलियों पे गिन रही हैं, और बातें मिलने पर होगी, अरे हां ज्यादा मिठाई मत लाइएगा,जानते ही हैं, कि सासू मां को डायबिटीज है,बिना खाए मानेंगी नहीं । हां लड्डन हलवाई की चमचम जरूर लाइएगा, छुटकी कह रही है कि मामा से कह दो घेवर जरूर लायेंगे । आगे की बात मिलने पर, भाभी को प्रणाम, बच्चों को बुआ का ढेर सा प्यार....
                    आपकी छोटी बहन 
                        जिज्ञासा....
                       २१/८/२०२१

एक पल की ख़ुशी

 रागिनी अपनी कार ढाबे से निकाल रही थी और सामने से एक औरत अपने दुधमुँहे बच्चे को शॉल में लपेटे आती दिखायी दे रही थी ,घूँघट से चेहरा ढका हुआ था,पर जब वो अपने बच्चे को सम्भालती तो उसके चेहरे की एक झलक दिख जाती,साथ में दो बड़े बच्चे और एक बूढ़ा आदमी भी दिखाई दे रहे थे। रागिनी के आगे कई गाड़ियाँ ज़ोर ज़ोर से हॉर्न बजा रही थीं उन्हीं शोरगुल में फँसी रागिनी को फिर उस औरत की झलक दिखायी दी उसने देखा तो वो औरत भी रागिनी को बड़े ध्यान से देख रही थी, आँखें चार होते ही वो औरत दौड़ती हुई रागिनी की गाड़ी की तरफ़ आई, उसका आँचल खुल गया था, पर सिर, फिर भी ढँका हुआ था, उसने आँचल ठीक करते हुए धीरे से कहा कि वो बूढ़े से आदमी हमरे ससुर हैं न दीदी, इसीलिए...और उसका इशारा आँचल की तरफ़ गया, जैसे कह रही हो कि उसने पर्दा उन्हीं से कर रक्खा है ।
             रागिनी को आवाज़ जानी पहचानी लग रही थी पर उस औरत को वो अभी भी पहचान नहीं पाई थी,औरत भी इस बात को समझ गई, वो चहक कर बोली अरे दीदी मैं रक्षाराम की बेटी सुमिंतरा..याद आया । मैके गए थे अरे ! अपने गाँव बिराहिनपुर । बियाह था न छोटे वाले भैया का । याद करो दीदी, कई साल पहले आप हमका पढ़ाए रहो चार किलास, हमरी बहन का भी पढ़ाए रहो, हमरी चाचा की लड़की रेखा का भी पढ़ाए रहो । अरे दीदी रेखवा तो प्राइमरी मा टीचर है, हम तव अस्पताल म चपरासिन हैं, लकिन रेखवा तव कुछ दिन मा बड़की मास्टराइन बन जाए, ख़ूब पैसा पीट रही है, हमहूँ आठ दस हज़ार रुपैया पाय रहे हैं, अब रेखवा की कौन बराबरी दीदी। रेखवा तो आपकी वही पुरानी बात गाँठ बाँधे रही थी कि पढ़ लिखकर कुछ अच्छा काम करो,नौकरी करो,चार पैसा कमाओ और अपना घर परिवार की स्थिति ठीक करो, हम लोग आप का रोज़ ही याद करत रहें कि,देखो न रागिनी दीदी कैसे पढ़ी लिखी है ? अपने गाँव का नाम रोशन किया है, खुद भी पढ़ीं और कितनो को पढ़ाय रही हैं, का हम अकेले अपना भी खुद नहीं पढ़ सकत । घर वाले नहीं पढ़ात रहे दीदी, लेकिन हम लोग घर में लड़ाई झगड़ा कर कर के किसी तरह पढ़ी औ हम चपरासिन,गोलू शहर म नौकरी कर रही, औ रेखा का का पूँछें, ऊ तो बढ़िया टीचर बन गई देखो, आज अपने ससुराल औ मैका सब सम्भाले है । दीदी आप तो गाँव आती ही नहीं, हम सब आपका कितना याद करें हमेशा,आपका क्या पता ? कितनी बात आपकी करें, लेकिन आप तो जीजा का छोड़ती ही नहीं हो । रागिनी को हंसी आ गई, आख़िर ऐसी बातें सुने ज़माना जो बीत गया था।
          सुमिंतरा अपनी बात कहती जा रही थी,और रागिनी ने धीरे धीरे अपनी गाड़ी, भीड़ कम होने पर, साइड में लगा ली और ड्राइविंग सीट के दरवाज़े से चिपकी अपने कामगार रक्षाराम की बेटी की सुंदर दास्तान सुनती जा रही थी और आज पहली बार पिता जी की कही बात याद आ रही थी कि निःस्वार्थ भाव से किया गया काम कभी ज़ाया नहीं होता ।और ऊपर से किसी को शिक्षित करना कब आपके जीवन में ख़ुशी का पल दे दे, आप ये सोच भी नहीं सकते ।अचानक सुमिंतरा के ससुर ने उसे आवाज़ दी और वो नमस्ते करके चली गयी और रागिनी के बच्चे भी कहने लगे कि माँ अब घर चलो । और वो गर्व का अनुभव करते हुए बच्चों से बातें करते हुए घर की तरफ़ चल दी।

      **जिज्ञासा सिंह**

पछतावा

    महीनों बाद माली के आते ही राधिका के तेवर गर्म हो गए,उसने माली के ऊपर चिल्लाना शुरू कर दिया और बगीचे में दौड़ दौड़ कर बिखरे हुए सूखे पत्तों तथा टूटी सड़ी लकड़ियों को दिखाते हुए उलाहना देने लगी कि काम करना हो तो ठीक से करो वरना हमें बता दो,हम किसी और को रख लेंगे।

     वर्षों पुराना माली सुनते सुनते थक गया और सोचने लगा कि मैं तो इतना बीमार था पर मेमसाहब ने एक बार भी हाल नहीं पूँछा कि तुम इतने दिन बाद क्यों आए हो ? ऊपर से इतना उलाहना ।वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, न बाबा न,मुझे अब काम ही नहीं करना, मेरे तो बच्चे भी कह रहे थे,कि बाबू बूढ़े  हो गए हो चुपचाप घर में रहो और भगवान का भजन करो, जब मेरे बच्चे मेरे साथ हैं,तो फिर मैं क्यूँ ये कोठियों के चक्कर काटूँ ? 

    आज ही सारे काम छोड़ दूँगा, अपना खर्चा ही क्या है ? मुनिया की अम्मा को मरे पाँच साल हो गए, बच्चे पेट पालने के लिए कमाते ही हैं, घर बार भी बनवा दिया है कोई ज़िम्मेदारी नहीं है मुझ पर,मुनिया भी अपने घर में खुश है,सोचते सोचते रग्घू माली का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर चढ़ गया, और उसने ज़ोर से खुरपी पटकी और चिल्लाया; लो सम्भालो अपना काम मेमसाहब, मैं तो चला सुख की रोटी खाने। 

     राधिका एक बार  रग्घू का मुँह देखती और दोबारा अपना गंदला सा बगीचा, उसने सोचा भी नहीं था कि जिस रग्घू को वो पंद्रह साल से ऐसे ही लताड़ रही थी,वो ऐसा भी निर्णय ले सकता है । रग्घू रामधुन गाता हुआ तेज कदमों से अपने घर की तरफ़ भाग रहा है, कि कहीं कोई फिर न उसे बंधुआ बना ले और राधिका हैरान परेशान पछता रही है कि उसने ऐसा क्यों किया ?

नानी माँ की धरोहर ( मातृ दिवस )

       संदूक खोलते ही कई सिर उसमें झांकते हुए, जब टकराने लगे तो बड़ी मामी बोली थोड़ा धीरज धरो सभी, अभी एक एक कर सब सामान निकलेंगे और सबको दिखाएंगे..इतना हड़बड़ाओ नहीं कोई खजाना नहीं है, जो लुट जाएगा, तसल्ली रखो, अम्मा का बक्सा है थोड़ा संभाल संभाल कर निकालेंगे उनका सामान, नहीं तो ऊपर से ही नाराज़ होने लगेंगी, तुमको सबको पता ही है, वो अपना सामान कितना संभाल के रखती थीं, इतना सुनते ही राजन का छोटा बेटा बोला पर वो तो भगवान जी के पास चली गईं न दादी,आप ही तो बता रही थीं, कि बड़ी दादी अब कभी नहीं आएंगी, फिर वो ऊपर से बोलेंगी कैसे ? चुप्प, उसकी माँ ने उसको शान्त किया, और फिर सब लोग थोड़ा गमगीन हो गए नानी की याद में, थोड़ी देर में दोबारा बड़ी मामी ने फिर नानी के बक्से का सामान दिखाना शुरू किया । 

    धीरे धीरे वो सामान निकालती जा रही थीं और सभी अचरज भाव से देखते जा रहे थे, उजली सफेद साड़ियां ,(नानी रंगीन कपड़े नहीं पहनती थीं ), कई अंगोछे, ( जिससे नानी पैर पोंछती थीं ) लकड़ी की छोटी छोटी कई छड़ियां मिलीं, जिसके एक छोर पर लिपटा हुआ कपड़ा बंधा था ( जिससे नानी अपनी पीठ खुजलाती थीं और हम सबको तोहफे में देती थीं ) कई हाथ के बुने पंखे और सुंदर कशीदाकारी की हाथ की बनी डलियां मिलीं, जिन्हें जाड़े के दिनों में आंगन में बैठकर वो बीना करतीं थीं, कई सुंदर कढ़े हुए रुमाल मिले तथा एक दर्जन दस्ताने मिले नानी के हाथ के बुने हुए, फिर पांच रुपए, दस रुपए की कई नोटों की नई नई गड्डियां मिलीं जो घर में उनके बेटे, पोते, पोतियाँ, नानी को खुश होकर देते थे, आखिर वो घर की सबसे बड़ी बुजुर्ग थीं, और नाना की कच्ची उम्र में असामयिक मृत्यु के बाद अपने आठ बच्चों को बड़े संघर्षों से पाल पोसकर उच्च शिक्षा दी थी जिससे घर में सब बेटे बेटियों के साथ साथ अगली पीढ़ी के बच्चे भी बड़े बड़े अधिकारी थे और पूरा परिवार नानी को बहुत सम्मान तथा आदर देता था ।

    मामी ने फिर नानी के बक्से से समान निकलना शुरू किया, अचानक एक पैकेट में एक जैसी तीन कंघियां निकलीं जिसे देखते ही मेरे तीनों मामा एक साथ बोल पड़े कि देखो हमारी अम्मा केवल तीन कंघी हम तीन भाईयों के लिए छोड़ी हैं जिसे कि हम तीनों एक एक ले लें और अम्मा कंघी के बहाने हमारे सिर सहलाती रहें और आशीष देती रहें ये सब सुनकर सभी लोग द्रवित हो गए, हमारी तीनों मामियां हतप्रभ रह गईं, कहने लगीं कि जरा अम्मा का भाग्य तो देखो, जीते जी पूजी गईं, और मरने के बाद भी उनकी औलादें पूजा करने को तैयार हैं । देखो हम लोगों का क्या होता है ? और बड़ी मामी ने अम्मा का सारा सामान नानी के सारे रिश्ते नातों में एक एक कर के बांट दिया .. सब के हिस्से में कुछ न कुछ आया और छोटे बाल बच्चों को बराबर बराबर पैसे दे दिए..सारे लोग खुश हो गए.. और बोले कि नानी की जगह अब बड़ी मामी को इस घर की बागडोर दे दी जाय.. बड़ी मामी ने सबको अपने गले से लगा लिया । लगा जैसे नानी लौट आई हैं, और बक्से की धरोहर के साथ साथ अपने परिवार रूपी धरोहर को सम्भाल रही हैं, जो उनके बनाए नियमों, संस्कारों और मूल्यों को सहेजने में तत्पर है,और नानी के जीवन की पूंजी भी।

                                                                                                                       **जिज्ञासा सिंह**

गणतंत्र दिवस की वो प्रभातफेरी जो भुलाए नहीं भूलती

     सर्दी के मौसम में सारे बच्चे सुबह सुबह नहा धोकर तैयार हैं , छोटी बुआ, चाचा, बड़े भैया, दीदी एवं गाँव के अनेकानेक बालवृंद इस ख़ुशी में फूले नहीं समा रहे, कि आज छब्बीस जनवरी है और हम सब लोग अपने गुरुजनों के साथ प्रभात फेरी के लिए कई गाँवों,मुहल्लों तथा बहुत सारे प्रतिष्ठित लोगों के यहाँ जाएँगे और देशभक्ति के गीत गाते हुए लोगों के घरों में तरह तरह की चीजें खाएँगे ।कुछ लोग जलेबियाँ, कुछ बताशे, कुछ लड्डू, कुछ समोसे तथा कुछ लोग अन्य मिठाइयाँ बँटवाते थे ।मेरे बाबाजी ज़्यादातर पूड़ी और सब्ज़ी खिलवाते थे ,वो कहते थे, कि कहीं समोसा जलेबी से पेट भरता है भला, मास्टर, मुंशी सब भूखे होंगे, और ये बालवृंद तो ख़ुशी के मारे सुबह से कुछ खाए ही नहीं होंगे, अतः ऐसा करो कुछ ठोस खिलाओ जिससे सबका पेट भर जाय, उनका आदेश मिलते ही मेरे घर की दादी,ताई, चाची, सब जुट कर फटाफट सौ लोगों के लिए भोजन, बतियाते बतियाते तैयार कर देती थीं । इधर घर में सब तैयारी चल रही है, उधर दरवाज़े पे बड़े बाबा,छोटे बाबा कई पड़ोसियों के साथ कुर्सी मेज़ सजाए ,आती हुई प्रभात फेरी का इंतज़ार कर रहे हैं 
        धीरे धीरे बच्चों की टोली की आवाज़ में देशभक्ति के तराने मेरे घर के दरवाज़े पे गूंजने लगते हैं और घर में हलचल सी मच जाती है, मैं नन्ही सी बच्ची नन्हें नन्हें पाँवों से दौड़कर अपने परबाबा के घुटनों में चिपक कर सारे बच्चों, गुरुजनों तथा अपने परिजनों के साथ अपनी मीठी, तोतली ज़ुबान में होंठ हिलाते हुए गाने लगती हूँ और दादी,ताई,माँ,चाची सभी घर के बरामदे में झाँकती हुई हमारा साथ दे रही होती हैं ।

            " वीर तुम बढ़े चलो ।
             धीर तुम बढ़े चलो ।।"

       थोड़ी देर में बाबाजी राष्ट्र्गान गाते हैं और हम सब उनका साथ देते हैं, फिर पँगत लग जाती है, और सब भोजन करते हैं,जलेबियाँ खाते हैं,ताऊजी सभी गुरुजनों को पान खिलाते हैं तथा सब एक दूसरे को गणतंत्र दिवस की बधाई देते हैं और फिर एक बार मेरे सारे भैया दीदी अपने गुरुजनों के साथ देशभक्ति के नारे लगाने लगते हैं  ।

               भारत माता की जय ।
              भारत माता की जय।।

        और फिर ये सुंदर कारवाँ तिरंगा थामे, देशभक्ति का नया तराना गाते हुए, शनैः शनैः मेरी आँखों से ओझल होता हुआ कहीं बहुत दूर चला जाता है जिसे अपलक मेरी आँखें आज तक ढूँढ रही हैं और मुझे वो दिखाई नहीं देता ।शायद देशभक्ति का वो मनोरम दृश्य मैं फिर कभी नहीं देख पाऊँगी ।

                            **जिज्ञासा सिंह**   

इनको कैसे समझाएँ ? ( कामवाली )

       अरे अजनारा तुम कैसे ? कहाँ से आ रही हो ? तुम तो बाहर चली गईं थीं । अरे हाँ ! तुम तो शायद हैदराबाद गई थीं, कब आईं वहाँ से ? क्या हुआ ? सपरिवार लौट आई क्या ? या तुम्हारा घरवाला अभी वहीं है ? क्या हुआ ? इस तरह से चुप क्यों हो ? 

               आज़ तीन साल बाद अजनारा को देखते ही मैंने सवालों की झड़ी लगा दी और वह खामोशी से मेरी बातों को सुनती रही । कहती भी क्या ? वह बेचारी तो अपने पति के साथ न चाहते हुए भी अपने सारे लगे लगाए काम छोड़कर हैदराबाद गयी थी ।मैंने उसे कितना रोका था कि तू इतने छोटे बच्चों को लेकर अजनबी शहर में कैसे रहेगी ? फिर तेरा घरवाला भी कोई ख़ास कमाऊ नहीं है, जो तेरे चार बच्चों को अच्छी परवरिश दे पाएगा, इसके अलावा उसकी रोज़ नशा खोरी की आदतें तुझे कहीं भूखों मरने के लिए न मजबूर कर दें । कुछ तो मैं अजनारा के लिए चिंतित थी,उससे ज़्यादा मैं अपने लिए थी,क्योंकि वह मेरी बारह साल पुरानी कामवाली थी,  जिसके भरोसे मैंने अपने छोटे छोटे बच्चों को पालकर बड़ा किया था, इसके अलावा मेरे हर सुख दुःख में उसने मेरा ऐसे साथ निभाया था, जैसे वह मेरे पिछले जन्म की क़र्ज़दार हो ।हाँ मैंने भी अपनी तरफ़ से उसके लिए, कुछ भी करने में कोई कोर कसर,  कभी भी नहीं छोड़ी, उसे जब भी कोई ज़रूरत पड़ी, मैं हमेशा खड़ी रही । इसलिए मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी, कि वह मुझे छोड़कर कहीं और काम के तलाश में जा सकती है । चूँकि सुबह से शाम तक मैं अजनारा- अजनारा करती रहती थी और उसने भी कभी किसी काम के लिए मना नहीं किया, इसलिए मुझे उसके बिना अपने घर का कोई काम होता दिखाई ही नहीं देता था । और मुझे उसकी आदत सी पड़ गई थी ।

                  पर मैं उसे कितना समझा सकती थी ? जब उसका घरवाला उसे नहीं छोड़ रहा था, तो वह रुकती भी तो कैसे ? वह अपना हिसाब कर अपने घरवाले के साथ,ज़्यादा पैसा कमाने हैदराबाद चली गई थी ।आज इतने दिनों बाद अपने दरवाज़े पर रुआंसी सी अजनारा को देख मैं हतप्रभ थी, मेरे कई बार पूँछने के बाद वह रोती हुई बोली कि यहाँ से जाने के बाद , उसके घरवाले ने उसे कभी कोई काम नहीं करने दिया पर उसकी बड़ी बेटी को किसी के घर छोड़ आया और बोला कि अब हमें कभी भी पैसों की कमी नहीं पड़ेगी,मेमसाहब तब से आज तक मैंने बेटी को एकबार भी नहीं देखा, और घरवाला खुद दारू पी कर पड़ा रहता है और जैसे ही नशा उतरता है, फिर कहीं से पैसे लाता है और खा पी के खत्म कर देता है, इतना कहते कहते वह ज़ोर ज़ोर से रोते हुए मेरे पैरों पे गिर पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी, मेमसाहब मेरी लड़की को बचा लीजिए ,मेरी लड़की को घरवाले ने बेंच दिया है वो लोग उसको अब हमें नहीं देंगे,घरवाले ने उनसे पैसा ले लिया है, घरवाले ने मुझसे झूठ बुलवाया था कि हम हैदराबाद जा रहे हैं, हम कहीं नहीं गए थे, हम तो यहीं छुप के रह रहे थे । मेमसाहब माफ़ कर दीजिए। वो बराबर रोये जा रही थी, और मैं अचम्भे से उसे देखे और सुने जा रही थी ।

                मुझसे जब नहीं सुना गया तो मैंने उसे चुप कराया और पीने के लिए पानी दिया, अब वह थोड़ी शांत थी, मैंने संयत होकर कहा, कि अब वह मुझसे क्या चाहती है ? उसने कहा कि उसका घरवाला सात दिन से ग़ायब है, मिल नहीं रहा है ।मैं ढूँढ ढूँढ के थक गई हूँ ।पुलिस भी कुछ नहीं बता रही है। मेरा तो सिर चकरा गया कि अब क्या करूँ ?फिर भी मैंने अपने जानने वाले एक पुलिस वाले को फ़ोन किया जो उसी इलाक़े का इंचार्ज था । बाद में पता चला कि उसका पति नशे की हालत में, किसी फूटपाथ पर पड़ा हुआ मिला,उसने इतना नशा कर लिया था कि फिर कभी उठ नहीं पाया, उसकी मौत हो गई ।

आज जब अजनारा पति और बेटी को खोकर, बिल्कुल असहाय, जर्जर, ग़रीबी और भुखमरी के कगार पर पहुँच गई, तब दोबारा मेरे पास आई है । मैं क्या करूँ ? कि उसका थोड़ा सा दर्द कम हो जाय। इसी सोच में डूबी मैं अपने ही कुछ प्रश्नों के उत्तर तलाश रही हूँ  ?

                                                                                                                        **जिज्ञासा सिंह**