पहलू बदलता चाँद

     गाड़ी ड्राइव करते हुए गीतिका को चमकता चाँद अपनी ओर आता दिखा, ओह.. चाँद अब तुम्हें क्या देखूँ ?
..उसके मुख से एक टीस सी निकली और जाते हुए चाँद को देखती हुई, धीरे धीरे गाड़ी घर के अंदर पार्क कर दी और आराम से सीढियाँ चढ़ते हुए छत के ऊपर चली गई । अपने कमरे का ताला खोल ही रही थी कि...
  चाँद फिर कनखियों से उसे ताक रहा था.. वह सोचने लगी,
सच ये तो बिलकुल मेरे उसी चाँद की तरह है, जिसकी मैं दीवानी थी...और वो मुझे चाँद सितारों की दुनिया जैसे सपने दिखाने के बाद एक अमीरजादी के पल्लू में बंध गया, क्या कमी थी मुझमें ? बस पापा दहेज ही देने को तो राज़ी नहीं थे.. मैं तो अच्छा कमा ही रही थी ।
  सोचते हुए उसकी नजर फिर चाँद पर पड़ी, अब वो उसकी छत छोड़कर किसी और छत की मुंडेर पर छुप गया था.. बिलकुल उसके चाँद की तरह किसी और के पहलू में....

**जिज्ञासा सिंह**

बोनसाई

अरे तुम्हें ये क्या हो गया ?
कैसे इतनी चोट लग गई ? मैं तुम्हें कई दिनों से ढूंढ रही थी ।
तुम्हारा फोन नंबर भी बंद आ रहा था । 
 कहां थे तुम ? बगीचा कितना गन्दा हो गया है ।
देखो सारे पौधे कितने खराब हो गए हैं ? बोनसाई को भी  कटिंग की जरूरत है । 
लावण्या नरेश से सारे प्रश्न पूछे जा रही है, पर उसकी निगाह नरेश के टूटे हाथ में बंधे प्लास्टर की ओर है ।
पूरे शरीर में कटे पिटे का निशान और पैर में बंधी मोटी पट्टी बता रही है, कि वो काफी चोटिल है ।
उसने पूँछा क्या पैर में भी ?.. नरेश ने बात काटते हुए बताया कि पेड़ पर चढ़ा था छंटाई करने के लिए और गिर गया मैडम  । बहुत चोट लगी थी हाथ पैर सब टूट गया था, पैर की तीनों बड़ी उंगलियाँ आधी से ज्यादा काट दी हैं डॉक्टर ने । गाँव में था न, अपना घरेलू इलाज कर रहा था । सड़न पैदा हो गई थी मैडम । अब तो काफी ठीक हूँ । पर इलाज लंबा चलेगा, आप लोगों से मदद माँगने आया हूँ । बड़ा महंगा इलाज है । बचूँगा तो फिर आप लोगों की बगिया संवारूंगा । बोनसाई बनाऊँगा ।आखिर बोनसाई बनाना ही तो मेरा हुनर है, उसके बिना मेरा जीवन कहाँ संभव है, वही मेरी रोजी रोटी है ।
  इतना कहकर नरेश अपने बनाए पीपल, बरगद और फायकस के शानदार बोनसाई के तरफ दर्द भरी निगाह से देखने लगा।
   और लावण्या असहाय कटे पिटे बोनसाई की तरह बंधे नरेश को देखकर, सोचने पर मजबूर हो गई कि बोनसाई तो कट पिट कर बंधकर, घर्षण करके एक नया रूप लेकर निखर जाता है, पर क्या मनुष्य के लिए ये संभव है..?

कुछ तो गड़बड़ है !

धड़कता सा क्यूँ है ? आज मेरा दिल । क्या परेशानी है ? 
   सुबह सुबह मैं हैरान सी क्यूँ हैं ? कुछ तो गड़बड़ है, वीणा स्नानघर में कपड़े धोते हुए पास लगे शीशे में खुद को निहारती है, चेहरे पे भी असमंजस की स्थिति स्पष्ट झलक रही है । 
    अरे हाँ..अब समझ आया... आज चिड़ियाँ गायब हैं । कहाँ गईं ? उनकी चूं चूं चां चां चाँ चाँ चीं चीं सब गायब है.. क्यूँ वो आज इतनी शांत हैं ? क्या बात हो गई ?
     सोचते हुए वो कपड़े डालने लगी । और देख रही कि कहीं चिड़ियाँ दिख जाएँ । पर कहीं एक भी नहीं... बस दो कौवे बैठे हैं सामने घर के वर्षों पुराने एंटीने पर ।
     और गली में कामवाली के दो तीन बच्चे कल दीवाली में दगे पटाखों में पटाखे ढूँढ रहे ।
   इतने में एक बच्चे ने चुटपुटी बम पटका और अचानक धड़ाम की आवाज आई और कौवे चौंकते हुए फुर्र हो गए ।
वीणा समझ गई चिड़ियाँ क्यों और कहाँ गायब हैं ?...... 

बेला की लड़ियाँ

   मुझे गजरा बहुत पसंद है, वो जब आता है शाम को.. अक्सर उसके हाथ में बेला की लड़ियाँ होती हैं, वो आता ही कितना है, आर्मी में है न...
   कोई बात नहीं जब घर रहता है.. तब तो वो ये लड़ियाँ लाना नहीं भूलता..कितने प्यार से मेरे बालों में सजाता है.. फिर उन्हें निहारता है.. खो सा जाता है वो मेरे बालों में सजी लड़ियों में... सैरंध्री अपने मन में सोचकर पुलकित हो रही है, सामने टीवी पर समाचार चल रहा है, अचानक एंकर खबर पढ़ती है कि आतंकवादियों से लोहा लेते हुए मेजर शहीद.. ओह.. एक आह.. दूजी आह.. तीसरी आह पर वो बेहोश हो जाती है ।
  होश आता है तो सामने एक रथनुमा वाहन उसके गेट पर खड़ा है, जो सफेद बेला की लड़ियों से सुशोभित है...

ममत्व

    रिमझिम बूंदों को महसूस करने के लिए नंदनी ने ज्यों ही बरामदे से आँगन की तरफ कदम बढ़ाया, छत पर जाने वाली सीढ़ी के कोने में उसे  कुछ हिलता सा दिखाई दिया । उसने चश्मा ठीक करते हुए अंधेरे की तरफ़ झाँका, सहसा वो चौंक पड़ी, फुर्र फुर्र पंख फड़फड़ाता  छोटा सा बिल्कुल नन्हा परिंदा, जिसकी आँखें भी ठीक से नहीं खुली थीं, इधर उधर ढेले की मानिंद लुढ़क रहा था, नंदिनी हाय कहके चीख पड़ी। देखा तो फ़ाख्ता का बच्चा घोंसले से गिर गया था।
        उसने दौड़कर, हौले हौले सहलाते हुए उसे उठाया और सीने से चिपका लिया, बिना सोचे समझे वो नन्ही जान उसके वक्ष से चिपक गया, यूँ कहें उसके कोमल नाखून नंदिनी के आँचल में फँस गए, और नंदिनी ने सोचा कि परिंदे ने उसे अपनी माँ बना लिया।
       उसने सत्तू का घोल और दूध में पानी मिलाकर बारी बारी से परिंदे को पिलाया और उसकी जान बचायी । इसी तरह परिंदे को पालते पोसते कई दिन गुजर गए, धीरे धीरे माँ चिड़िया भी आने की कोशिश में, परिंदे के आसपास मंडराने लगी, अपने चिरौटे से मिलने के लिए उसका मन मचलने लगा, नंदिनी की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा, जब एक दिन माँ फ़ाख्ता अपने नन्हें चिरौटे को पंखों में छुपाती नज़र आई । एक दो दिन बाद माँ बच्चा गलबहियाँ करने लगे, परिंदे के पंखों ने भी रफ़्तार पकड़ी और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और फुर्र से उड़ गए, और जाली की खिड़की से, सुकून भरी नज़रों से नंदिनी, उन्हें उड़ता देखती रह गयी । उसकी ममता ने टीस मारी और मुँह से निकला । आह !!

      **जिज्ञासा सिंह** 

पहचान

       अखबार का पन्ना पलटते ही विमला की दृष्टि अचानक उसमें छपी, हुई एक फोटो पर गई,और वो पहचानने की कोशिश में लगने ही वाली थी, कि उसे याद आ गया चित्र में दिखता चेहरा कौन है ? और फिर बड़े जोर से अपने पति को पुकारते हुए वह बोली देखो तुम्हारी कांति की बिटिया की फोटो अखबार में निकली है और वो इनाम ले रही है, मुख्यमंत्री जी के हाथ से ।
       रामबाबू भी जल्दी से आए और आँख फाड़के अखबार में झांकने लगे, कहाँ कहाँ कहते हुए ? आखिर कांति उनकी चचेरी बहन है और ननकई उनकी भांजी।
       विमला ने पट्ट उंगली रख फोटो दिखा दी और अपनी विश्वविजयी कहानी भी सुना दी कि याद है न कैसे कांति एक दिन हमारे पास इसी बिटिया के समय लिंग पता करने आई थी कि लड़का होगा तभी इसे जन्मेंगे नहीं तो गर्भपात करा देंगे, काहे से उसके पहले से तीन बिटिया हैं, सास ससुर बोली मारते हैं, आदमी भी उसका कोई कम नहीं था । तब हम्ही उसको समझाए थे कि बच्चा चार महीने का है, मर जाओगी गर्भपात कराके। अब चाहे लड़की है या लड़का संतोष करो । लड़की लड़का से कम नहीं होती। अब देखो दोनो माँ बाप मुख्यमंत्री के बगल खड़े कैसे फोटो खिंचा रहे ? आख़िर बिटिया नाम रोशन कर दी  न।
       रामबाबू से न रहा गया कहने लगे अरे कांति का नम्बर है हमारे पास । तनिक फोन करो । विमला ने भी देर न करते हुए फोन लगा दिया उधर से फोन उठते ही कांति तो लगा जैसे खुशी के मारे फूट पड़ेगी । बोली "जिज्जी सवेरे से ई पचासवां फोन है, सब ननकई को बधाई दे रहे । हमरा तो गोड़े जमीन पर नाई है, तुमका जल्दी मिठाई खवइबे ।
मुखमंत्री जी हमहू का "पहचान" गए और बधाई दिए रहें, हमसे कहें कि सब तुमरी मेहनत का नतीजा है बिटिया डी यम की नौकरी पाई है। हमार दिन बहुर गै जिज्जी" । विमला को कांति की मेहनत याद आते ही हँसी फूट गई । उसने रामबाबू की तरफ़ आश्चर्य से देखा, रामबाबू ने फ़ोन ले लिया और बधाई देकर फोन रख दिया ।

**जिज्ञासा सिंह**

विधवा की बिंदी

 बिट्टन की शादी में कम्मो बुआ के आते ही जो खसुर-फुसुर शुरू हुई वो विदाई के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रही।

   कहीं नन्ही की अम्मा, तो कहीं बड़ी ताई जी, तो कहीं पिताजी की फुआ बराबर एक ही परिचर्चा कर रही हैं, कि "देखो जरा कम्मुईया को आदमी को गुजरे सालो नही बीता औ ई माथे पर बिंदी लगाए, पायल पहने घूम रही है, कौनो रीत रेवाज से इसे मतलब ही नाही है, देखो न चेहरा पै कउनो दुखो नहीं दिखि रहा, अब सहर से आई हैं, तो का एतनो नहीं जनतीं कि आदमी के मरे पे कौनो सिंगार नाही किया जात" ।

रेखा जिधर भी जा रही, यही प्रपंच उसे सुनाई दे रहा, आख़िर उसने देखा कि कम्मो बुआ छत के कोने में अकेली बैठी सुबक रही हैं, उससे रहा नहीं गया । वो दौड़ के उनके पास पहुँची और उन्हें समझाने लगी कि आप इतनी पढ़ी-लिखी होकर इन अनपढ़ी गंवार औरतों की बातों में आ गईं ।

     आप खुद ही देखिए इनके हाल, ये सिवाय प्रपंच और बकवास के अलावा कुछ करती भी हैं और आप दिल्ली जैसे शहर में नौकरी करती हैं, वो भी ऑफिस में ।

इतना सुनते ही कम्मो रेखा के गले लग, फफक-फफक के रो पड़ी और कहने लगी कि मैं खुद ही बिंदी नहीं लगा रही थी, मगर मेरी सासू माँ ने पैरों में पायल और बिंदी लगा दी और बोलीं कि तेरी अभी उमर ही क्या है ? बेटा गया तो ये भगवान की मर्ज़ी थी, अब आज से तू ही मेरा बेटा और बहू दोनो है । तू अच्छे से रहा कर, जैसे पहले रहती थी। और यहाँ मेरे मायके वाले हैं, जिन्हें ससुराल वालों से ज्यादा साथ देना चाहिए, वो मेरा मजाक बना रहे हैं । मैं यहाँ अब कभी नहीं आऊँगी । मेरे ससुराल वाले शिक्षित और समझदार हैं । ये भ्रांतियाँ और कुरीतियाँ मेरे बस की नहीं ।

    रेखा ने सहमति में सिर हिला दिया और बोली अभी जाकर इन सभी को ठीक करती हूँ, इतना लताड़ूँगी कि आइंदा इनकी ऐसी दकियानूसी बातें करने की हिम्मत नहीं होगी । और पापा को भी बताऊँगी सारी बात, पापा के नाम से तो ये प्रपंच करना भूल जाएँगी । जानती ही हो दीदी पापा कैसे हैं ? आशा की उम्मीद लिए दोनों बहनें दर्द भरी मुस्कराहट रोक नहीं पाईं, और मुस्कुराते हुए एक बार फिर एक दूसरे के गले लग गईं ।

           **जिज्ञासा सिंह**

                  लखनऊ