आखिरी स्नेह

    पैरों को चूमते हुए दूब धीरे धीरे सहला रही है माली के तलवे । माली को गुदगुदी होती है, भीना सा मासूम अहसास भी । 

  पर वो क्या जाने ? जाड़े में गर्म और गर्मियों में सर्द अहसास देने वाली उस नन्हीं मासूम छुईमुई दूब का सौंदर्य । जो गर्म खुरदुरी मिट्टी में एक कोपल के साथ जमती है और धीरे धीरे मिट्टी की गर्मी सोखकर अपने अंदर समाती हुई पूरे लॉन में फैल जाती है, आने जाने वाले लोग अपने रेशमी या खुरदुरे पावों को नर्म मुलायम अहसास देने के लिए पैसे से खरीदे हुए जूते उतार देते हैं और अंगड़ाई लेते हुए अपने प्रिय का हाथ पकड़े उसके दामन में पसर जाते हैं।

माली को कहते हुए आज उसने सुना है, कि अब वो पहले जैसी नहीं रह गई है, आज उसका आखिरी दिन है, क्योंकि ऋतु परिवर्तित हो चुकी है और उम्रदराज होने से उसकी रेशमी पत्तियाँ झड़ रही हैं, अतः उसे जड़ से उखाड़ कर खत्म किया जाएगा उसकी जगह कोई नई घास ले लेगी । दूब तो बस अपने माली को आखिरी स्नेह दे रही है ।               

**जिज्ञासा सिंह**

माँ के नाम एक पत्र

प्यारी माँ,
      प्रणाम !
कैसी हैं आप ? सोचती तो थी कि आपको एक चिट्ठी लिखूँ । पर समझ न आया क्यों ? कब और क्या लिखूँ?
  अब मौका मिला है, तो लिख रही हूँ । आपको ये पत्र । आशा है, ये पत्र और उसमे लिखी मेरे बचपन की एक कविता भी जो कि नीचे लिखूँगी, आपको मेरी मन की अपरिमित गहराइयों में ले जाएगी और आपको समझना पड़ेगा कि एक नन्हें बच्चे को छोड़कर माएँ ऐसे नहीं जाया करतीं।
   आपको शायद पता न हो पर एक माँ के न होने का एक बच्चे को, आजीवन एक अनजाना दंश झेलना पड़ता है, जो कि वो स्वयं भी नहीं जानता कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? वो तो निश्छल है, जल की तरह निर्मल है ।
  फिर क्यूँ ये द्वंद, ये दंश उसे पल पल इस निर्मम संसार में झेलने पड़ते हैं । जो शायद उसे जब तक जीवन है, तब तक ऐसे ही झेलना पड़ता है । ऐसे में आप का मुझे यूँ छोड़कर जाना मुझे कभी दुख, कभी गुस्सा दे गया ।
    सच्ची माँ अब तो बहुत कुछ सीख गई हूँ, उम्र ने जीना सिखा दिया है तुम्हारे बिना भी ।
अब किसी परछाईं का पीछा नहीं करती । जब पीछा नहीं करती तो परछाइयाँ मुझे धोखा भी नहीं दे पातीं। आप निश्चिंत रहिए । मैं आपकी ही तरह धीर गंभीर हूँ, धैर्यवान हूँ, ऐसा मैं नहीं, सभी कहते हैं कि मैं आपकी ही परछाई हूँ, हूबहू। अब कोई गुस्सा नही है आपसे । जीवन अच्छा लग रहा है ।
अब तो आपकी पुरानी किताबें भी अक्सर पढ़ती हूँ, कि उनके बीच शायद आपने मेरे लिए कोई चिट्ठी छोड़ी हो । पर वो मिली नहीं अभी तक । हाँ आप तो अचानक चली गई थीं ।
       जहाँ कहीं भी हो आप अपना ख्याल रखिए। हाँ ये कविता जरूर पढ़िएगा । जिसे मैंने काफी समय पहले आपके लिए आपकी याद में लिखी थी...

बचपन की आस । मेरी भी होती माँ काश ।।
माँगती गुड़िया व कार । सपनों से भरा संसार ।
वे कहतीं अरी वो नटखट । तू कितनी भोली है चल हट ।।
क्या संसार इतना छोटा है । वो तो भैंसे सा मोटा है ।।
वहाँ बहुत बड़ा सागर है । तेरी तो छोटी सी गागर है ।।
कैसे भरेगी इतना पानी। गागर फूटी तो रूठ जाएँगी नानी ।।
वो रूठी तो कहानी कौन सुनाएगा?पारियों का राजा आएगा।
डोली सजाएगा । सागर पार संसार ले जाएगा ।।
वहाँ होगी जब रात । तुझे आएगी माँ की याद ।
कौन सुनाएगा लोरी । दूध से भरी कटोरी ।।
तुझे नींद नही आएगी । आँखों में रात बीत जाएगी ।।
हो जाएगी भोर । नाच उठेगा मोर ।।
इतने में मैं उठी झनझना ।टूट चुका था मेरा सपना ।।
काश कि ये सपना फिर आए । भ्रम में जीवन बीत जाए ।।
 
                       आपकी दुलारी बेटी
                             गुड़िया
                             लखनऊ
                          ७/५/२०२२

बलि का बकरा

मेंऽऽ..मेंऽऽ..की आवाज़ ..कच्च्च..और सब कुछ शान्त !
   घर में खुशी का माहौल है, बलि की प्रक्रिया के लिए बकरे को नहला धुला के तैयार कर लिया गया है, आज भरोसे अपनी औलाद के नाम पर बकरे की बलि करेगा, जिससे उसके बच्चे की जान पर कभी कोई आँच न आए और जो आँच आने वाली हो वो इस बकरे की जान पर बीत जाए । 
पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली अपनी इस परम्परा को पूरा करके भरोसे आज निवृत्त होना चाहता है । 
   इसी बीच पता चलता है कि खानदान में चौधरी काका की मौत हो गई है, घर में सूतक लग गया है, कोई शुभ काम नहीं हो सकता, छः माह तक । 
    अब बकरा छः माह के लिए घर की देहरी पर बंध जाता है, भरोसे का बेटा रग्घू बकरे के साथ खेल खेल में दोस्ती कर लेता है, चूमता है, सहलाता है और धीरे धीरे बकरे से घुल मिल जाता है, नाम रखता है, रुस्तम । दोनों ऐसे दोस्त हैं, कि क्या कहने ?
   बकरा रुस्तम का "रु" सुनते ही रग्घू पर जान न्योछावर करने को तैयार है, औ रग्घू तो रुस्तम के बिना जिंदा ही नहीं रह सकता..
      ..रग्घू रुस्तम.. रुस्तम रग्घू..का खेल चालू है, गूलर की पत्ती रुस्तम का प्रिय भोजन है और रग्घू दिनभर गूलर पे चढ़ा दिखाई देता है रग्घू दौड़ता है, रुस्तम दौड़ाता है, दोनों छः महीने की लंबी छलांग लगा समय को पार कर लेते हैं ।
   फिर से शुभदिन लग गए हैं, रुस्तम की बलि का दिन आ गया  है । आखिर मनौती का बकरा घर में बंधा है, बलि तो देनी ही है । उसे फिर नहलाया गया । तेल, काजल, सिंदूर लगाया गया । रग्घू से कोई कुछ नहीं बताता । छोटा है, न । 
   रग्घू पेड़ पर पत्तियाँ तोड़ रहा है, बगीचे में गोबर से लिपे स्थान पर कई लोग बैठे हैं, जैसे किसी का इंतजार कर रहे हों, अचानक रुस्तम रुस्तम की आवाज आती है,आवाज़ सुनकर रग्घू रुस्तम की तरफ़ देखता है, रुस्तम में..में.. करता हुआ दौड़ता दिखाई देता है, दो-तीन लोग पकड़ते हैं उसे, और एक आदमी लाल रंग के कपड़े से उसका मुंह ढक देता है ।
    दूसरा आदमी बड़ी सी गड़ांस निकालता है, अचानक कुछ ऐसा महसूस होता है, जैसे कि कोई कह रहा हो, एक ..दो ..तीन और रुस्तम का सिर एक कराहती हुई मेंऽऽऽ.. के साथ धड़ से अलग हो जाता है, गूलर के पेड़ पर चढ़ा हुआ रग्घू यह सब देखता है, उसके हाथ से डाल छूट जाती है, वह डाल से टूटे हुए बेल की तरह गिरता है और भेहराकर फूटकर बिखर जाता है.. बलि की रस्म पूरी हो जाती है ।
 
**जिज्ञासा सिंह**
   

देवरानी जेठानी

 किटी पार्टी में आज चर्चा का विषय है “देवरानी जेठानी के सम्बन्ध”। 

सारी औरतें देवरानी जेठानी के रिश्ते की खटास की परिचर्चा करने में मशगूल हैं, हर औरत अपने बुरे अनुभव का रोना रो रही । शांति भी कुछ बताने की चाहत में भटकते हुए बीस साल पहले की यादों में खो जाती है, और सारा दृश्य उसकी जेठानी के इर्द गिर्द घूम जाता है ।

    शांति खाने की मेज के सहारे खड़ी अपनी दुकान के गत्ते काट काट कर बंडल बना के रख रही, आख़िर दीवाली सिर पर है, और मिठाई के डिब्बों की डिमांड बहुतायत में है, पास ही मेज पर ही उसकी एक महीने की बेटी लेटी है, उसको भी उसे दूध पिलाना है, गत्ते का बंडल अभी काफ़ी बचा है, उसका हाथ मशीन की गति से चलायमान है, इतने में पास खड़ी जेठानी, जो नौ महीने के गर्भ से है, उससे धीरे से कहती है, लगता है कि उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है, दर्द बढ़ रहा है, और वह डॉ. के पास जा रही । उसने सब्ज़ी बना दी है, तुम समय निकाल रोटियाँ बना लेना । जेठानी को तरस भरी नज़रों से देखते हुए शांति फिर गत्ते काटने लगती है । रात के नौ बजे हैं, बार बार घड़ी देखती है, इधर गत्ते, उधर रोटी, और साथ में पति का रोष भरा चेहरा, जो सुबह जाते वक्त धमकाते हुए दिखा गए थे कि तीन दिन हो गए ये गत्ते का ढेर लगे हुए । तुमसे कुछ नही होता, आज खत्म हो जाय, मुझे शाम को डिब्बे बनाने हैं। सारा कुछ सोचते सोचते उसे जेठानी की चप्पलों की भारी सी आहट सुनाई दी ।उसने हड़बड़ाकर आश्चर्य भरी नजरों से देखा । अरे दीदी आप लौट आईं, क्या हुआ ? 

हाँ..छोटी..डॉ ने कहा है अभी दो तीन घंटे का समय है, मैंने सोचा बगल की ही तो बात है, छोटी के पास बहुत काम हैं, बिटिया भी रो रही होगी। क्यों न रोटी बना आऊँ? रोटी बना के चली जाऊँगी। फिर तब तक तू भी खाली हो जाएगी और मुझे लेकर चलेगी ।

आज देवरानी जेठानी परिचर्चा में शांति की आंखें पूरी तरह गीली होकर बह चलीं, उस महामना जेठानी की याद में ।

**जिज्ञासा सिंह**

दवा की दुइ टिक्की

       मंगरू आज फिर गिरता संभलता दोस्तों के सहारे किसी तरह घर पहुँचा ।
       दुलारी उसे देखते ही उसको और उसके दोस्तों को पानी पी पी कर श्राप देने लगी । उसके बच्चे आँख  मींजते अपने अपने बिछौने में उठकर बैठ गए, मंगरू को लिटाकर सारे दोस्त दुलारी से मंगरू को संभालने का इशारा करते हुए एक एक कर घर से निकल गए ।
बचा मंगरू ।
उसने जेब से बोतल निकाली, दो घूँट मारी और बड़बड़ाने लगा । साथ ही झोपड़ी के कोने में उल्टियाँ भी करता जा रहा । पीछे से दुलारी झाड़ू से पति को मार रही । सब बच्चे चिल्ला रहे बाप के ऊपर । अरे गंदगी कर रहा है..पापा गंदगी कर रहा है.. । हम कैसे सोएंगे ? उसी चिल्ल पों के बीच मंगरू दुलारी को बाल पकड़ जमीन पर गिरा देता है, वो ऐं ऐं.. मार डाला..मार डाला.. चिल्लाती है, और १०..१५ मिनट तक ऐसे ही शोर चलता है, थोड़ी देर बाद सारा मामला शांत हो जाता है ।
  सुबह एक कबाड़ीवाला झोपड़ी के सामने खड़ा है और दुलारी एक बोरी में भरी हुई, ढेर सारी खाली बोतलों का सौदा कर रही है ।
   आँख मिलते ही कहती है, जो कुछ भी मिल जाय, साहब.. ललिया बीमार है न.. दवा की दुइ टिक्की ही लै लूँगी । 

**जिज्ञासा सिंह**

तीक्ष्ण दृष्टि

शांता एक वीडियो दिखाने के लिए घर के सभी सदस्यों को बुलाती है, और कहती है, देखो ये रहा वो वीडियो, जो कल वायरल हुआ है, वीडियो में एक लड़की पुलिसवाले से मोबाइल छीनते हुए गाली गलौज कर रही है, और सौ तमाशबीन उसे घेरे खड़े हैं । लड़की नशे में धुत है, और बार बार लड़खड़ा रही है, कई लोग उसे समझा रहे हैं ।
    यहाँ घर में,कांता के मोबाइल में भी आठ आँखें बड़े गौर से उस वीडियो को देखने में व्यस्त हैं ।
   वीडियो का अंत होते होते पिता जी के मुख से निकल ही गया, कि इसीलिए लड़कियों को बाहर भेजने में डर लगता है।
अब तो हम अपनी सोना को क्या ही बाहर पढ़ाएंगे ?
 शांता अवाक और स्तब्ध रह गई ।

**जिज्ञासा सिंह**

कोने की दुर्गंध

सुबह सुबह सोकर उठते ही राघव पूरे घर में नाक भौं सिकोड़े घूम रहा है, अनजानी सी गंध घर में दिनोदिन बढ़ती जा रही है ।
राघव रोज़ समझने की कोशिश में है, कि आखिर हवा में ये कैसी अजीब सी नाक को भेदती गंध भरी है, और वो गंध दिन प्रतिदिन उसके इर्द गिर्द बढ़ती जा रही है ।
    अहसास तो है उसे कि कभी तो उसने इससे मिलती जुलती गंध को महसूस किया है, पर अब उसे ये नहीं भा रही ।
  वह जोर से पत्नी को आवाज़ लगाता है और कहता है कि एक तो वैसे ही महीनों से धूप न निकलने से घर में सीलन सी भरी है, ऊपर से ये अजीब बिसैंध जैसी बदबू । तुम्हें तो पता ही है कि मुझे घर में इस तरह की कोई भी गंध बर्दाश्त नहीं । करती क्या हो सारा दिन ? घर साफ रक्खा करो । सौ बार बताया है । वो जो़र से दहाड़ा और रूम फ़्रेशनर लेकर घर में छिड़कने लगा । 
  पत्नी सकुचाते हुए अंदर कोने वाले कमरे की तरफ इशारा करती है कि अरे आप को पता नहीं न.. आप तो जाते नहीं उधर.. वो बाबू जी न कई दिनों से ठंढ के मारे कमरे से बाहर नहीं निकले हैं और नहाए नहीं हैं, उन्हीं की.. वहीं से..और नाक पे शॉल का कोना रख लेती है। राघव को गंध का परिचय मिल जाता है.. चिल्लाना छोड़, वो जल्दी जल्दी ऑफ़िस जाने के लिए तैयार होने लगता है...

**जिज्ञासा सिंह**