इकलौता बेटा- कहानी

    “गहराई नापना उसकी फ़ितरत थी अब वो क्या जाने ? उसे कितने गहरे उतरना होगा असल गहराई नापने के लिए… वह उतर चुकी है उस अंजान सागर की असल गहराई नापने.. जिसमें असंख्य विषधरों का निवास है.. और वो उनकी प्रकृति से भी परिचित नहीं है.. कौन जानें बचती भी है या फिर विषधरों का निवाला ही बनना उसकी क़िस्मत को मंज़ूर है”

    सुबह के पाँच बजे हैं, सुमित्रा अभी-अभी फूल तोड़कर लौटी है, उसकी बेटी कनेरी फूलों की डलिया ले कर, फूल तोड़ने के लिए निकल रही है, आज डलिया भरकर फूल चुनकर ही लाना है, अम्मा के लिए, वह आज देवी जी का दरबार सजाने के लिए, भर -भर के माला बनाएगी, मंदिर में भंडारा भी है, कनेरी का भाई केशव कई दिनों का बाहर गया, अभी तक लौटा नहीं है, वो रहता था तो ठेला भर के फूल और कलियाँ लाता था.. क्यों न! उसे भोर में तीन बजे ही मोहल्ला-मोहल्ला, गली-गली में फूलों वाले घरों में चोरी ही करनी पड़े, पर उसका ठेला कभी ख़ाली नहीं लौटा, एक दिन तो उसे पार्क के माली ने पकड़ ही लिया था उसने बहुत हाथ-पाँव जोड़े, माफ़ी माँगी तब जाके माली ने छोड़ा था.. वह कहाँ मानने वाला था, दोबारा फिर एक बंगले के लॉन में घुसा था साहब ने सीसीटीवी कैमरे में देख, पुलिस से पकड़वाया था, पुलिस वालों के सामने उसने अपनी विधवा माँ का राग अलापा था..

 पुलिसवाले की माँ भी विधवा थी.. इसलिए उसे माफ़ी मिल गई थी । लग तो रहा है कि इस बार भी वो किसी के हत्थे चढ़ गया है फूलचोरी या किसी और चोरी के केस में,और हवालात में है, कनेरी के पूँछने पर अम्मा बार-बार गोलमोल जवाब दे रही है, कनेरी से न रहा गया वो आज फिर पूँछने लगी…

“भला बताओ अम्मा ई भैया अभी तक नहीं आया और तुम कभी कह रही हो कि नानी के यहाँ है, कभी कहती हो पंजाब चला गया ज़्यादा पैसा कमाने.. अब सही -सही बताओ अम्मा भैया कहाँ है ? फिर तो नहीं कोई साहब पकड़ लिए, क्योंकि उसका ठेला भी वापस नहीं आया, अगर वो नानी के यहाँ जाता तो ठेला तो कमरे के सामने गली में ही खड़ा करता । 

और आज समीना आँटी भी कह रही थीं कि तुम्हारा भाई कहीं दिखाई नहीं दे रहा, कहीं गया हुआ है क्या ?”

“वो कह रही थीं कि भाई गली के सबसे ख़तरनाक गुंडों के साथ दिख रहा है आजकल, जिनके साथ घूमता है वो, वो सब जेल की सैर कर चुके हैं कई बार, अम्मा को समझाना कि भाई पर ध्यान दे ।तुम तो जानती ही हो अम्मा समीना आँटी बच्चों को सुधारने के एक एनजीओ में काम करती हैं, जब उनके बेटे का नाम टेररिस्ट अटैक में आया था तब उन्होंने कितनी मुसीबतें झेलीं, कितने कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाया और कितना पैसा लगाया, बेचारी ने घर तक गिरवी रख दिया था । यहाँ तक कि दाने-दाने को मोहताज हो गईं थीं उसी बीच में अंकल को दमा हुआ और वो चल बसे, ओह क्या मुसीबत थी उनके ऊपर ? और देखो आज भी, अभी तक उबर नहीं पाई हैं, उनका भी तो इकलौता बेटा आजीवन कारावास काट रहा है, अम्मा समीना आँटी को एनजीओ वालों ने बहुत मदद की, तभी वो सम्भाल पाईं, नहीं तो वो तो पुलिस से तंग आकर आत्महत्या ही कर लेतीं, आख़िर अंकल तो चले ही गए, अम्मा आँटी सही बात ही समझाएँगी, जब से वो एनजीओ से जुड़ी हैं, तब से उनको हर बात की सही जानकारी रहती है, उनको हमें हल्का नहीं लेना चाहिए, आख़िर वे हमारे भले की बात कर रही हैं ।”
कनेरी भाई को ले चिंतित हो,अपनी बात आगे बढ़ाते हुए फिर माँ से कहती है..

  “देख लो अम्मा तुम हमारी पढ़ाई छुड़वा के हमसे फूल तुड़वाती हो और भैया को कहती हो कि वो तुम्हारा "इकलौता बेटा" है उसकी बात छुपाती हो.. उसके बारे में हमसे झूठ बोलती हो, ये ठीक नहीं अम्मा.. भैया इसी में बिगड़ा है.. अभी तो वो ख़ुद ही फँसता है, किसी दिन वो तुम्हें भी फँसवाएगा तब समझोगी, ये उसकी छोटी-छोटी चोरी-चकारी मत छुपाओ अम्मा.. 
   पापा तो हैं नहीं, दुनिया तुम्हें ही कहेगी कि दो ही बच्चे थे, बाप दारू पीके मर गया और माँ ने बच्चों की ग़लतियाँ छुपा के उन्हें बरबाद कर दिया। अब भैया पढ़ेगा तो है नहीं, कम से कम चोर-उचक्का तो न बने ऐसा कुछ करो.. हम बरबाद हो जाएँगे अम्मा, अगर भाई इस तरह की हरकत करता रहा और तुम छुपाती रही तो ।”

“अरे कन्नो तू ऐसा क्यों सोचती है ? कि मैं भाई को बर्बाद कर रही और वो समीना आँटी, जो तुम्हें भड़का रही है, उसका बेटा कौन सा दूध का धुला है ? जो हमें ज्ञान दे रही.. अबकी बार कुछ कहे तो उसको जवाब दे देना, कहना कि आँटी पहले अपने लड़के को सम्भालो फिर मेरे भाई को कुछ कहना ।”

सुमित्रा कनेरी की बातों को सुनकर, भड़क गई और उसे समझाने की कोशिश करने लगी । पर कनेरी कहाँ समझने वाली थी ? वो भी अब कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी इस बार उसने ग्रेजुएशन कर लिया था उसे भी भले-बुरे का ज्ञान था । वो बार-बार माँ को समझाने की कोशिश करती है ।

“ समझो अम्मा बात को.. तुम तो बदला लेने वाली बात करने लगीं, समीना आँटी कह रही थीं कि देखो मेरा बेटा हाथ से निकल गया मैं कुछ नहीं कर पाई इसीलिए तुम्हारे भाई की फ़िक्र कर रही हूँ, अब बेटा मैं तो कह ही सकती हूँ, तुम्हारी अम्मा ज़रूर बुरा मान जाएँगी, पर तुम कहना ज़रूर । मेरा तो घर बर्बाद हो ही गया, कम से कम तुम्हारा न बर्बाद हो ।”

कनेरी अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि सुमित्रा ग़ुस्से में चिल्लाने लगी..
“ अरे जानती हूँ, समीना आँटी कितनी अच्छी है ? कितनी परिवार पालक है, पहले तो घूमती रही, अब समाज सुधारक बन रही.. ख़बरदार जो समीना आँटी की तरफ़दारी की, उसके कहे में पड़के लड़की, अपने ही भाई की ही दुश्मन बनी जा रही है, अब कल देखो तुम, समीना की ख़ैर लेती हूँ, अपने लड़के को बर्बाद कर दिया अब मेरे बच्चों को चली है पाठ पढ़ाने ।”

“माँ-बेटी दोनों अपना-अपना तर्क देती रहीं पर सुमित्रा ने कनेरी को यह नहीं बताया कि भाई कहाँ है ? आख़िरकार थक कर कनेरी फूल चुनने के लिए जाने लगी, वो मुश्किल से अभी अपने कमरे के आगे वाली गली के नुक्कड़ से मुड़ी ही थी कि तीन चार मोटर सायकिल से पुलिसवाले भरभराकर उसके सामने से निकलते हुए उसकी गली में जाकर रुक गये और सामने से जा रहे दौलत को एक फ़ोटो दिखाकर पूँछने लगे कि क्या इस लड़के को देखा है ? दौलत ने पहले तो फ़ोटो देखी फिर नुक्कड़ पर खड़ी कनेरी को देखा और पुलिस वालों के सामने असमंजस में सिर हिला दिया.. दरोग़ा ने ज़ोर की हाँक लगाई ।
“देख बे ये इसी गली का पता है ना ।” मोबाइल में झाँकते हुए दौलत ने सहमति में सिर हिला दिया ।”

“जी साहब ! यहीं का है ।”

“फिर तू कैसे नहीं जानता है इस लड़के को ? ये यहीं का रहने वाला है, ठीक से देख ।”

दूसरे दरोग़ा ने उसके पैर में एक सोंटा बजाया ।
“जी साहब देखा तो है शायद ।” 

दौलत ने कनेरी की तरफ़ देखते हुए कहा ।
कनेरी धीरे-धीरे अपने घर की तरफ़ लौटने लगी
उसके मन में भाई को लेकर शंका होने लगी, वो पुलिस वालों के पीछे आकर ठिठक कर खड़ी हो गई और दयनीय दृष्टि से दौलत की तरफ़ निहारने लगी ।

कनेरी को देखते ही सिपाही बोला..
 “ऐ लड़की देख इस फ़ोटो को, इसे पहचानती है, इसी गली का पता है न.. अभी मोड़ पर तो लोगों ने बताया कि यही गली है ।”

“जी.. जी.. ये पता तो इसी गली का है, देख फ़ोटो देख ये, इस लड़के को देखा है, कभी ।”

फ़ोटो पर नज़र पड़ते ही कनेरी के होश उड़ गए
भाई का फ़ोटो पुलिस के हाथ में देख वो सकपका गई.. फूलों की डलिया हाथ से छूट गई, सरकता हुआ, दुपट्टा ठीक करते हुए बोली..
 “जी साहब देखा है इसे.. मेरा भाई है ये । इसने क्या जुलुम किया साहब ?”

“इसने.. इसने तो वो काम किया है, जिसकी माफ़ी नहीं है ।”

“ऐसा क्या किया साहब ?”.. हाथ जोड़ते हुए कनेरी दरोग़ा के पैरों में झुक गई ।

तेरा भाई.. तेरा भाई.. वो बदमाश भाई नहीं, वो भाई के नाम पर कलंक है ।”

उसने एक फूल जैसी बच्ची के साथ.. छिः-छिः.. मुझे तो कहते हुए भी शर्म आ रही है, तेरे सामने । उस बदमाश ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर तीन साल की बच्ची के साथ बड़ा घिनौना आपराधिक काम किया है, बदमाश रोज़ फूल चुराता था जहाँ से, उसी घर के चौकीदार की एक छोटी सी बच्ची को टॉफ़ी देने के बहाने, फुसलाकर ले गया और.. और फिर अपने दोस्तों के साथ.. ओह कहने में भी शर्म आ रही है ।
इतना सब बताते-बताते दरोग़ा अचानक आक्रोशित हो गया और ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ने लगा ।
 “बुला अपनी माँ को, कह रहा था तेरा भाई कि उसके इस काम में उसकी माँ भी शामिल है, वो सब जानती है, बुला जल्दी !”
दरोग़ा चिल्लाने लगा..
 बुलाती है कि नहीं, हम उसी को लेने आए हैं, ऐसी भी माएँ होती हैं साली.. जो अपने बच्चे के बलात्कार की भी जानकारी रखती हैं.. और मुँह नहीं खोलतीं… ओह !

दरोग़ा बराबर चिल्लाए जा रहा था और गली के हर दरवाज़े के पर्दे खुलते जा रहे थे ।कनेरी आँखों में आँसू भरे, सहमें हुए कदमों के साथ अपने कमरे की सीढ़ियों पर चढ़ रहीहै, सामने माँ अपने एक हाथ में कलियाँ थामें, दूसरे में धागा पड़ी सुई लिए, देवी को पहनाने के लिए माला गूँथ रही है, कनेरी माँ के हाथ से माला खींच लेती है और ज़ोर से चिल्लाती है..
अम्मा पुलिस तुम्हारे इकलौते बेटे को ढूँढ रही है।

**जिज्ञासा सिंह**

पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती थी परम्परा

 प्रकृति दर्शन पत्रिका में प्रकाशित आलेख:-


बावड़ी,तालाब,पोखर,कूप, नदियाँ।

ढूँढते अस्तित्व हैं, घर, गाँव, गलियाँ ।

बरस कुछ पहले थे खुश, आबाद जो,

भूलती जाती है उनको आज दुनियाँ ॥”


   कब किसको वक्त की चोट लग जाय, कह नहीं सकते ? गाँव-गलियाँ, दरो-दीवार, संस्कृति-सभ्यता, घर-चौबारा, बाग-बगीचा, नदी-पोखर, कुआँ-तालाब.. आज हर जगह कुछ न कुछ बदलाव दिखायी दे रहा है, कुछ बदलाव ज़रूरत के साथ-साथ, वक्त की माँग हैं, कुछ बदलाव बदलते परिवेश के कारण अपनी निजी ज़रूरतों, आकांक्षाओं के चलते हो रहे हैं, इन्हीं बदलावों में से एक सबसे बड़ा बदलाव, आजकल ज़्यादा दिखाई दे रहा है, वो है, गाँवों से शहरों की तरफ़ पलायन ।


    इस पलायन ने गाँवों की पुरानी संस्कृति सभ्यता के साथ-साथ, गाँव से जुड़े तमाम जीवन संयंत्रों का ह्वास किया है, इन्हीं में से एक प्रमुख ह्वास है, जल के विभिन्न स्रोतों का… 


       चाहे वो नदियों-तालाबों का हो या पोखरों-बावड़ियों का, दशक दो दशक पहले ये हर गाँव की शोभा हुआ करते थे, शोभा के साथ-साथ ये जलस्रोत, गाँव की तमाम ज़रूरतें भी पूरी करते थे.. चाहे वो सिंचाई हो घरेलू ज़रूरतें हों, लोग कुँओं, तालाबों और नदियों पर निर्भर रहते थे । इन जलस्त्रोतों की सबसे बड़ी ख़ासियत थी कि इनमें बरसात का पानी भी संचयित होता था । जिससे ये सालो-साल कृषिभूमि की सिंचाई के साथ जीवन-यापन के लिए भी पर्याप्त जलापूर्ति  करते थे । प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर ये जलस्रोत कृषिभूमि की उर्वरता भी बनाए रखते थे । अनाज की भरपूर पैदावार होती थी, इसके अलावा बिना रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक दवाइयों के, मामूली खर्च पर की गई खेती से इंसान तमाम बीमारियों से भी बचा रहता था ।


    परंतु विकास के नाम पर धीरे-धीरे नलकूपों, नलों जैसे बहुत से नवीन जलस्त्रोतों का अविष्कार हुआ और लोग इन पुराने जलस्त्रोतों को नज़रंदाज़ करने लगे । जिसके परिणामस्वरूप आज ये स्थिति है, कि तालाबों, नदियों से निकली छोटी-कटी, नदियों पर लोगों ने अतिक्रमण करके क़ब्ज़ा कर लिया और अपने घर, मकान, दुकान बना लिए । 


     जो कुएँ पानी के अतुल्य स्रोत थे, आज वे जर्जर और सूखे पड़े हुए हैं, कुएँ और तालाब जैसे जलस्त्रोत गाँवों की जीवनज्योति के साथ-साथ आपसी एकता और समरसता के भी प्रतीक थे.. एक कुएँ पर कम से कम दस परिवार पानी भरता था । 


    उदाहरण के तौर पर मेरे ख़ानदान के कुएँ पर, पूरा गाँव पानी भरता था।  हमारे कुएँ का विवाह आम के बाग के साथ हुआ था । इस परम्परा को निभाने के लिए पहले कुआँ खुदाया गया साथ ही साथ आम का बहुत बड़ा बाग लगाया गया और धूमधाम से आम और कुएँ का विवाह हुआ, कई गाँवों का भोज हुआ था.. तत्पश्चात् हमारे गाँव के पास की, पचास गाँवों की आबादी शादी-विवाह में उस कुएँ के फेरे करने आती थी और हम लोग बचपन में गर्मी की छुट्टियों में ये सारी रस्में देखते थे । ये परम्परा पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती थी ।


   हालाँकि आज भी शादी- विवाह में उस कुएँ के फेरे की मान्यता है, परंतु जब इस बार मैं गाँव गई तो उस कुएँ की  दुर्दशा देख मन द्रवित हो गया गया । कुएँ के किनारे ख़ाली ज़मीन पर जहाँ लोगों की भीड़ होती थी, लोग खड़े होकर पानी भरते थे, मेरे ही ख़ानदान के लोगों ने दीवार बना के क़ब्ज़ा कर लिया है, कुएँ की तलहटी में पानी अभी भी मौजूद है, परंतु वो जर्जर, बेहाल और जंगली पौधों से पटा हुआ है, जिस कुएँ की साल भर में सफ़ाई होती थी, पूजा होती थी, शादी विवाह में मान्यता थी, वही कुआँ मुझे आज अपनी बेहाली पर, धाड़ मार-मार के रोता हुआ दिखायी दे रहा था । मैं भी क्या करती ? मुँह ज़ुबानी लोगों से ये कह के चली आई, कि इस कुएँ का पानी पियो न पियो तुम्हारी मर्ज़ी, परंतु सफ़ाई तो कराते रहना चाहिए । आख़िर बाप-दादा ने बड़े अरमान से खुदवाया था ।


जिज्ञासा सिंह

लखनऊ

स्त्री-सशक्तिकरण

रीनू आज बहुत परेशान है ?

आधे घंटे से बर्तन धोती जा रही और दुपट्टे के किनारे से अपने आँसुओं को पोंछती जा रही ।        


राधिका अभी-अभी स्त्री-सशक्तिकरण के किसी कार्यक्रम में अपना विचार रख के लौटी है.. जिसका विषय था "घरेलू कामगार स्त्रियों का शोषण" ।

  पानी पीते हुए उसने पति को कार्यक्रम की सफलता और अपनी वाहवाही के किस्से सुनाने शुरू ही किए थे कि चाय रखती हुई रीनू ने दहाड़ मारकर रोते हुए उसका हाथ पकड़ लिया और बोली..


" मेमसाहब पहले मुझे न्याय दीजिए, फिर और किसी को न्याय दिलाइएगा ।अब मुझसे नहीं रहा जाता, आज आपकी बात सुनकर इतनी हिम्मत आई है, कि आपसे कुछ कह सकूँ ।”


“अरे क्या बात है बेटा ? तुम इस तरह क्यों रो रही हो ? क्या हुआ ? कुछ बताओगी या यूँ ही रोती रहोगी ।”

“ये.. ये.. साहब..”

इतना बोलते ही सामने बैठे साहब का चेहरा फ़क्क से उड़ गया, वो बनावटी आश्चर्य के साथ, पत्नी की निगाह बचाकर उसे घूरते हुए बोले..

“किसने ? क्या किया ? बताओ.. बताओ.. तो सही, हम तुम्हारी हर समस्या का हल ढूँढेंगे ।”

 रीनू की उँगलियाँ साहब की तरफ़ उठी की उठी रह गईं और वह चुप हो, उनके इशारे को देखने लगी । फ़ोन की तरफ़ जाती साहब की निगाह और इशारे ने उसे एक बार फिर ये समझा दिया था कि रीनु के कुछ राज़, जो साहब ने फ़ोन में क़ैद कर रखे हैं, रीनु के मुँह खोलते ही मेमसाहब के साथ-साथ, दुनिया के सामने आ जाएँगे.. और लोग उसका और उसके माता-पिता का जीना दूभर कर देंगे ।

उसने अपना इरादा बदल दिया, मेमसाहब के लाख पूँछनें पर भी, “स्त्री-सशक्तिकरण” पर अपने विचार नहीं रख पाई ।


**जिज्ञासा सिंह**

ख़ानापूर्ति


“मैम !

 आप नहीं गईं मेडिकल कॉलेज.. गीता मैम को देखने.. सारी टीचर्स गयी हैं आज 

 जूनियर टीचर शैली ने प्रिन्सिपल मैम से बड़े स्नेह से पूँछा 


अरे इसमें देखने वाली क्या बात है ?”


क्यों मैम बीमारी की स्थिति में तो देखने जाना चाहिए न ? बस एक आप ही हैं, जो कह रही हैं.. कि देखने क्या जाना ? ऐसा क्यों मैम ? गीता मैम स्कूल की इतनी पुरानी और आपकी चहेती टीचर हैं, ऊपर से आपसे इतने अच्छे संबंध ।आजकल तो सभी लोग अपने बीमार मित्र या रिश्तेदार को देखने जाते है, क्या आपकी उनसे किसी बात पे नाराज़गी है क्या ?


नहीं शैली ! नाराज़गी की तो कोई बात नहीं मैं इसीलिए नहीं जा रही कि वो मेरी अज़ीज़चहेती टीचर हैउसे दिखावे के लिए, देखने क्या जाना ..?”


..सोचती हूँ,जाने से पहले छुट्टी लूँ कम से कम एक हफ़्ते कीकुछ पैसे निकालूँ बैंक सेउसकी सेहत के लिए कुछ बनाऊँ अपने हाथों से.. फिर जाऊ उसके पास  देखने नहीं.. उसकी सेवा करने.. खिला-पिला के सेहतमंद करने और तुम तो जानती ही होकि उस बेचारी के ख़ुद के अलावा कोई कमाने वाला नहीं है । इस समय उसे पैसे की बहुत ज़रूरत होगी, हो सकेगा तो लौटते वक्त कुछ पैसे भी उसके हाथ में रख दूँगी 


“ओह तो ये बात है..” शैली अचरज में भर गई ।

प्रिन्सिपल ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए, जारी रखी.

 “शैली हमें किसी के दुःख में “ख़ानापूर्ति” करने के बजाय तन-मन-धन से दर्द का हिस्सेदार बनने की कोशिश करनी चाहिए.. बीमारी में हर रोगी को प्रेम, सहानुभूति और सेवा सुश्रूषा की ज़रूरत होती है ?


**जिज्ञासा सिंह**

परीक्षा

“बेटा ! ये जो मेज पर प्लेट में धुले हुए, दो सेब रखे है, जाओ एक दादी माँ को दे दो एक तुम खा लेना ।” शगुन ने बेटे से कहा ।

बेटे ने सेव उठाया और चलते-चलते.. दाँतों से कुतरना शुरू कर दिया दूर बैठी, दादी ने ये दृश्य देखा और ज़ोर-ज़ोर से बड़बड़ाने लगीं ।

“देखो तो.. इसने दोनों सेव जूठे कर दिए ।”

सुबह से किसी बात पे झल्लायी शगुन ने आव देखा न ताव, बेटे के गाल पर तड़ातड़-तड़ातड़ थप्पड़ जड़ दिए । बेटा सुबकने लगा.. दादी हाँ-हाँ कहती रह गईं ।

अंदर कमरे से ये दृश्य देखता मुकुंद हतप्रभ हो बेटे के पास आया, उसने बेटे को पकड़ा और झकझोरते हुए पूँछा “तुमने दोनों सेव क्यों जूठे कर दिए ?”

अरे पापा.. मैं तो देख रहा था कि कौन सा सेव ज़्यादा मीठा है ? दादी माँ को मीठे सेव पसंद है न.. उसदिन वे मम्मा से कह भी तो रही थीं कि तुम्हें सेव लेना नहीं आता.. पुराना-बासी-फीका सेव लेकर चली आती हो, बस इसीलिए चख रह था पापा.. फिर दादी माँ ने मुझे कहानी में भी बताया था.. कि शबरी ने भगवान राम को झूठे बेर खिलाए थे.. चख-चख के और उन्होंने बिना कुछ कहे खा लिए थे प्रेम में ।

धीरज और धर्म की सीख देते.. दादी, माँ और पापा के चेहरे देखने लायक़ थे.. नन्हें मासूम ने दो पीढ़ियों के धैर्य की परीक्षा जो ले ली थी ।

**जिज्ञासा सिंह**




साँचे

“मिट्टी का लोंदा उलट-पलट कर एक सार कर लिया है ।”

“बस चाक पर चढ़ा दूँ और बर्तन तैयार ।”

“आओ बैठो न।”

“तुम्हें रूप बदलना सिखाती हूँ ।”

“इस लोंदे के अनगिनत रूप । न जाने कितने पुतले, कितने बर्तन ।”

“कभी खिलौना बन बच्चों का मनोरंजन करेगा ।
दीपावली में लक्ष्मी-गणेश बन मन्दिर में बिराजेगा ।दीप बन जगमगाएगा ।
सुराही बन ठंडक देगा ।
बड़भूजा भार में चढ़ा लैया-चना भूनेगा ।
गमले में पौधे लग जाएँगे ।
आचमनी से भगवान को धूप दे दूँगी ।

और तो और अस्थिकलश भी बन जाएगा मेरा एक दिन.. इस मिट्टी के लोंदे से ।”
   “न जाने कितने पुतले भगवान के, शैतान के, इंसान के बन जाएँगे ।”
 
“और एक दिन सभी को मिट्टी में मिल खुद लोंदा बन जाना है ।”

…छन्नी से सूखी मिट्टी छान, मिट्टी को मसल-मसल कर सानती हुई पत्नी ने पति से कहा ।”

कुम्हार मंद-मंद मुस्कुराता हुआ, “साँचे” में लोंदा डाल पुतला ढालने में तल्लीन हो गया ।

**जिज्ञासा सिंह**

ऑफ़िस का मौन.. लघुकथा

स्वप्निल लगातार बोले जा रहा था…

“तुम कहती हो कि मेरे अंदर धैर्य नहीं, बिलकुल भी संयम नहीं ! अरे तुम क्या जानो ? जनोगी-सुनोगी-समझोगी, तभी न ! कितना वर्कलोड होता है ऑफ़िस में. उसपे खूसट बॉस की किचकिच । कितना मौन, कितना धैर्य रखे इंसान ।”

“अब इधर तो कम्पनी को पूरा टारगेट देना है साल भर का, ऊपर से ऑफ़िस की प्रतिस्पर्धा । सब एक दूसरे की काटने में लगे रहते हैं, बॉस के चमचे, दोमुँहे। उनके पास तो और कोई काम ही नहीं, सिवाय बॉस को चाटने के ।

   यहाँ घर आओ तो तुम्हारा प्रवचन सुनो । थोड़ा धैर्य रक्खो, धीरज धरो । सुन लिया करो, वे बॉस हैं, तुम्हारे ।थोड़ा चुप रह जाओगे तो क्या बिगड़ जाएगा ? अब ये मौन व्रत मुझसे नहीं होता । एक हफ़्ते से तुम्हारी सलाह पर ही काम कर रहा था ऑफ़िस में । फिर भी मुआँ बॉस आज भिड़ ही गया ।

अरे क्या हुआ ? खुल के कुछ बताओगे भी या फिर बड़बड़ाना ही है । रागिनी ने जैसे ही कहा ..

स्वप्निल ने चिल्लाना शुरू कर दिया..

  रागिनी समझ चुकी थी कि ये ऑफ़िस का मौन बोल रहा है ।

**जिज्ञासा सिंह**