बेला की लड़ियाँ
ममत्व लघु कथा
पहचान … लघु कथा
विधवा की बिंदी… लघु कथा
बिट्टन की शादी में कम्मो बुआ के आते ही जो खसुर-फुसुर शुरू हुई वो विदाई के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रही।
कहीं नन्ही की अम्मा, तो कहीं बड़ी ताई जी, तो कहीं पिताजी की फुआ बराबर एक ही परिचर्चा कर रही हैं, कि "देखो जरा कम्मुईया को आदमी को गुजरे सालो नही बीता औ ई माथे पर बिंदी लगाए, पायल पहने घूम रही है, कौनो रीत रेवाज से इसे मतलब ही नाही है, देखो न चेहरा पै कउनो दुखो नहीं दिखि रहा, अब सहर से आई हैं, तो का एतनो नहीं जनतीं कि आदमी के मरे पे कौनो सिंगार नाही किया जात" ।
रेखा जिधर भी जा रही, यही प्रपंच उसे सुनाई दे रहा, आख़िर उसने देखा कि कम्मो बुआ छत के कोने में अकेली बैठी सुबक रही हैं, उससे रहा नहीं गया । वो दौड़ के उनके पास पहुँची और उन्हें समझाने लगी कि आप इतनी पढ़ी-लिखी होकर इन अनपढ़ी गंवार औरतों की बातों में आ गईं ।
आप खुद ही देखिए इनके हाल, ये सिवाय प्रपंच और बकवास के अलावा कुछ करती भी हैं और आप दिल्ली जैसे शहर में नौकरी करती हैं, वो भी ऑफिस में ।
इतना सुनते ही कम्मो रेखा के गले लग, फफक-फफक के रो पड़ी और कहने लगी कि मैं खुद ही बिंदी नहीं लगा रही थी, मगर मेरी सासू माँ ने पैरों में पायल और बिंदी लगा दी और बोलीं कि तेरी अभी उमर ही क्या है ? बेटा गया तो ये भगवान की मर्ज़ी थी, अब आज से तू ही मेरा बेटा और बहू दोनो है । तू अच्छे से रहा कर, जैसे पहले रहती थी। और यहाँ मेरे मायके वाले हैं, जिन्हें ससुराल वालों से ज्यादा साथ देना चाहिए, वो मेरा मजाक बना रहे हैं । मैं यहाँ अब कभी नहीं आऊँगी । मेरे ससुराल वाले शिक्षित और समझदार हैं । ये भ्रांतियाँ और कुरीतियाँ मेरे बस की नहीं ।
रेखा ने सहमति में सिर हिला दिया और बोली अभी जाकर इन सभी को ठीक करती हूँ, इतना लताड़ूँगी कि आइंदा इनकी ऐसी दकियानूसी बातें करने की हिम्मत नहीं होगी । और पापा को भी बताऊँगी सारी बात, पापा के नाम से तो ये प्रपंच करना भूल जाएँगी । जानती ही हो दीदी पापा कैसे हैं ? आशा की उम्मीद लिए दोनों बहनें दर्द भरी मुस्कराहट रोक नहीं पाईं, और मुस्कुराते हुए एक बार फिर एक दूसरे के गले लग गईं ।
**जिज्ञासा सिंह**
लखनऊ
देर आए दुरुस्त आए … लघु कथा
मिठाई का डिब्बा लिए आज कलुआ को देखा, आश्चर्य से भर गई । मन सोचते हुए उस पुरानी घटना पर अटक गया और सोचने लगी कि अरे कैसे उस दिन इन्होंने कलुआ को अपनी गाड़ी के नीचे तक दबा दिया था, जब वो आधी रात को अंधेरे में नशेड़ियों और जुआरियों के साथ दारू के नशे में, पेड़ के नीचे बैठा जुआ खेल रहा था और इनको गाड़ी की लाइट में दिख गया था झूम झूम ठहाका लगाते हुए, इनको ग़ुस्सा आता भी क्यों न, सुबह ही कलुआ बच्चे की बीमारी के बहाने इनसे ५०० रुपया माँग ले गया था ।
कलुआ हमारा पुराना माली था, अतः हम सब फ़िक्रमंद थे। रात की घटना के बाद हमने सुबह ही कलुआ के बीवी और माँ बाप को बुला लिया और कलुआ को ख़ूब धमकवाया,माँ बाप से कहा कि तुम सब इसे छोड़ दो हम भी छोड़ देंगे, घर और ऑफ़िस सब जगह से निकाल देंगे,ये दर दर भीख माँगेगा, होश ठिकाने आ जाएँगे, आख़िर हद होती है।घरवाले पहले से परेशान थे, सब तुरत राज़ी हो गए।आख़िर ये कोई पहली घटना नहीं थी।
कलुआ हफ़्ते भर इधर उधर भटकता रहा, थक हारकर एक दिन आकर इनके पैर पड़ गया, माफ़ी माँग ली, और वादा किया कि अब वो सुधर जाएगा । वो दिन और आज का दिन कलुआ धीरे धीरे रास्ते पे आ गया, और जब उसे सरकारी आवास मिला तो उसी में अपने भी पैसे मिलाकर घर और एक दुकान बनवाया है, जिसकी दावत पतिदेव घर जाकर खा आए और मेरे लिए कलुआ मिठाई लेकर हाज़िर है।
**जिज्ञासा सिंह**