“अम्मा अम्मा ई आज़ादी का है ?”
“औ ई अमरित महोत्सव तौ हम कभी सुने नाहीं ।”
“ऊ रामू कहे है कि घर घर झण्डा लगाओ औ देसगीत गाओ.. यही है आज़ादी ।”
“हाँ बबुआ.. ऐसै कुछू हमहूँ सुने है ।”
“तौ का अम्मा एक झण्डा हमहूँ लगाय दें”
“तू का करिहे झण्डा, झण्डा से आज़ादी का.. का मतलब, हमय लोगन का तो आज़ादी तबय है जब घर म खाय का रासन.. तन पर बसन.. औ सोवे का झुग्गी म जगह होय..झूठे झण्डा झण्डा लगाए है ।”
“अच्छा हाँऽऽ..बबुआ.. ई तौ देस की बात है, ले दस रूपिया औ जा झण्डा ख़रीद ले औ लगा दे झुग्गी के पन्नी फाड़ के.. औ बरसात म देख नजारा जब टप्प-टप्प चुए.. औ जाड़े म पन्नी के छेद से बर्फ़ का गोला गिरे तौ हमरी छाती पर मत चिपकियो कि हाय अम्मा जड़ाय रहे..।”
“हेहेहेहे अम्मा तुम तौ..।”
“तुम तौ का..”
“अरे अम्मा हम तौ क़हत रहे कि झण्डा तौ फिरी म मिलि रहा बस लगाना है।”
“अच्छाऽऽ”
“हाँ सही कह रहे अम्मा ! पूरी बस्ती म झण्डा बँटि रहा, बड़े-बड़े साहब नेता सब बांटि रहे, ढूँढ-ढूँढ सबै दे रहे ।”
“अच्छाऽऽ”
“अब हम समझीं बबुआ ।”
ई अमरित महोत्सव.. वहोत्सव नाहीं, कौनो चुनाव आवे वाला है ।”
**जिज्ञासा सिंह**