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बेला की लड़ियाँ

   मुझे गजरा बहुत पसंद है, वो जब आता है शाम को.. अक्सर उसके हाथ में बेला की लड़ियाँ होती हैं, वो आता ही कितना है, आर्मी में है न...
   कोई बात नहीं जब घर रहता है.. तब तो वो ये लड़ियाँ लाना नहीं भूलता..कितने प्यार से मेरे बालों में सजाता है.. फिर उन्हें निहारता है.. खो सा जाता है वो मेरे बालों में सजी लड़ियों में... सैरंध्री अपने मन में सोचकर पुलकित हो रही है, सामने टीवी पर समाचार चल रहा है, अचानक एंकर खबर पढ़ती है कि आतंकवादियों से लोहा लेते हुए मेजर शहीद.. ओह.. एक आह.. दूजी आह.. तीसरी आह पर वो बेहोश हो जाती है ।
  होश आता है तो सामने एक रथनुमा वाहन उसके गेट पर खड़ा है, जो सफेद बेला की लड़ियों से सुशोभित है...

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक !
    कभी सीमा पर तो कभी देश के ही अन्दर, हमारे न जाने कितने जवान लड़ते हुए या किसी साज़िशी हमले के तहत शहीद हुए हैं.
    इन शहीदों के शवों पर तप फूल्माएं चढ़ाई ही जाती हैं लेकिन इनके साथ ही साथ इन शहीदों के परिवार-जन के शहीद सपनों-आकांक्षाओं पर भी मालाएं चढ़ा दी जाती हैं.

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(२५-११-२०२१) को
    'ज़िंदगी का सफ़र'(चर्चा अंक-४२५९ )
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. बहुत बहुत आभार अनीता जी,चर्चा मंच में इस लघुकथा को स्थान मिलना एक सुखद अनुभूति है,आपका बहुत अभिनंदन ।मेरी हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई

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  4. बहुत मार्मिक रचना है प्रिय जिज्ञासा जी। शहीद जवान की चिता में उसके अपनों के अनगिन सपने भी स्वाहा हो जाते हैं। आदरणीय गोपेश जी ने सच कहा शहीद की पार्थिव देह के साथ ही उनके परिवार के ध्वस्त हुए अरमानों पर भी माल्यार्पण हो जाता हैं। देशभक्ति की त्वरित उमड़ी भावनाओं के बीच सिसकते हृदयों की वेदना ढकी छिपी ही रह जाती है।

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  5. सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आपका रेणु जी ।

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  6. हृदय द्रवित हो गया लगता है रोम रोम सिहर गया।
    दारुण भाव अंतर तक चाक करते।
    मर्मस्पर्शी।

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  7. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ नवंबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  8. श्वेता जी, आपका बहुत बहुत आभार । रचना के चयन केबल आपका हार्दिक अभिनंदन, शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह ।

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  9. बहुत ही हृदयस्पर्शी लघुकथा जिज्ञासा जी शहीद के अपने ही जानते हैं कि उन पर ताउम्र क्या गुजरती है। कम शब्दों में बड़ा दर्द उजागर किया है आपने।

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    1. आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद ।

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  10. अंतर को कुरेदती कलम कैसे चली,क्यों चली
    हृदय चीरती रचना..
    सादर..

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  11. ओह , आज पहला लिंक खोला और मार्मिक सत्य को कहते ये लघु कथा पढ़ी । सच है शहीद के परिवार के सारे सपने यूँ ही ध्वस्त हो जाते हैं ।हृदय को भेदती लघु कथा ।

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